सुप्रीम कोर्ट के ताज़ा आदेश ने प्रदेश के हजारों कार्यरत शिक्षकों की नींद उड़ा दी है। अदालत ने साफ कर दिया है कि पहली से आठवीं तक पढ़ाने वाले सभी शिक्षकों के लिए अब टीईटी (Teacher Eligibility Test) पास करना अनिवार्य होगा।यह आदेश सोमवार को आया और इसके बाद से ही पूरे उत्तर प्रदेश के शिक्षा जगत में हड़कंप मच गया है।
इस परीक्षा में आवेदन करने की अनुमति भी नहीं मिलेगी जो शिक्षक न्यूनतम योग्यता पूरी नहीं कर पाएंगे। यानी, वे चाहे तो भी TET परीक्षा में भाग नहीं ले सकेंगे।
किन शिक्षकों पर पड़ेगा सबसे ज्यादा गहरा असर?
इस आदेश से लगभग 50,000 से अधिक शिक्षक प्रभावित होंगे, शिक्षक संगठनों का अनुमान है। इनमें मुख्य रूप से पाँच प्रकार के शिक्षक हैं:
- वर्ष 2000 से पहले नियुक्त शिक्षक – ये वे शिक्षक हैं जो पुराने नियमों के आधार पर नियुक्त किए गए थे। उस समय TET की अनिवार्यता नहीं थी।
- स्नातक में कम अंक पाने वाले शिक्षक – जिन शिक्षकों के ग्रेजुएशन में न्यूनतम अंक तय मानक से कम हैं।
- बीएड धारक और विशिष्ट BTC नियुक्त शिक्षक – जिनकी नियुक्ति बीएड या विशिष्ट BTC (Basic Training Certificate) के आधार पर हुई थी।
- मृतक आश्रित नियुक्त शिक्षक – जिनकी नियुक्ति मृतक आश्रित कोटे के तहत हुई है।
- डीपीएड और बीपीएड धारक शिक्षक – यानी शारीरिक शिक्षा में डिप्लोमा (DPEd) या बैचलर डिग्री (BPEd) वाले शिक्षक।
इन कैटेगरीज के बड़े हिस्से के शिक्षक अब सीधे-सीधे बाहर हो जाएंगे।
क्यों नहीं कर पाएंगे आवेदन?
कई कार्यरत शिक्षक न तो BTC धारक हैं और न ही डिग्रीधारक में न्यूनतम अंकों की शर्त पूरी कर पाते हैं।सुप्रीम कोर्ट के आदेश के बाद अब ऐसे शिक्षक आवेदन करने से भी वंचित हो जाएंगे।इसका सीधा असर उनके करियर पर पड़ेगा। कई ऐसे शिक्षक हैं जिन्होंने 15-20 साल तक नौकरी की है, लेकिन अब नए नियमों के चलते उनका भविष्य अधर में लटक गया है।
प्रदेश के शिक्षक संगठनों की प्रतिक्रिया
फैसले के बाद शिक्षक संगठनों में नाराज़गी है। संगठनों ने कहा है कि यह फैसला हजारों परिवारों की रोज़ी-रोटी पर असर डालेगा।
कई संगठनों ने सरकार से हस्तक्षेप करने की अपील की है। उनका कहना है कि सालों से पढ़ा रहे शिक्षक अगर अचानक से अयोग्य घोषित कर दिए जाएं तो यह अन्याय होगा।
कुछ संगठन इस मामले पर संयुक्त मोर्चा बनाकर दोबारा सुप्रीम कोर्ट जाने की तैयारी कर रहे हैं।
पुनर्विचार होना चाहिए – शिक्षक नेता
शिक्षक नेताओं का कहना है कि सरकार को इस आदेश पर पुनर्विचार करना चाहिए।
वे मांग कर रहे हैं कि कार्यरत शिक्षकों को राहत देने के लिए विशेष प्रावधान बनाए जाएं।
उनका तर्क है कि अगर ऐसा नहीं हुआ तो:
- हजारों परिवारों की आजीविका खतरे में पड़ जाएगी।
- शिक्षा व्यवस्था में अचानक से बड़ी कमी आ सकती है।
- ग्रामीण और कस्बाई इलाकों में पढ़ाई बुरी तरह प्रभावित होगी।
क्या कहती है शिक्षा व्यवस्था पर इसका असर?
अगर 50 हजार से ज्यादा शिक्षक अचानक से बाहर हो जाते हैं, तो शिक्षा व्यवस्था पर बड़ा असर पड़ेगा।
प्रदेश के प्राथमिक और उच्च प्राथमिक विद्यालयों में पहले से ही शिक्षकों की कमी है। ऐसे में, इन शिक्षकों को बाहर करने से स्थिति और खराब हो सकती है।
शिक्षा विशेषज्ञों का कहना है कि सरकार को चाहिए कि:
- कार्यरत शिक्षकों को एक बार का अपवाद (One-Time Exception) दे।
- उन्हें TET पास करने के लिए अतिरिक्त समय या विशेष मौका मिले।
- अनुभव और सेवा अवधि को भी योग्यता के रूप में शामिल किया जाए।
प्रभावित शिक्षकों की राय
मीडिया से बातचीत करते हुए कई शिक्षकों ने अपनी चिंता व्यक्त की। उनका दावा है कि बच्चों को वर्षों से शिक्षित कर रहे हैं। उन्हें अचानक नए नियमों के आधार पर परीक्षा से बाहर करना अब उचित नहीं है।
एक शिक्षक ने कहा – “हमने 18 साल तक पढ़ाया है। अब कह रहे हैं कि आप योग्य नहीं हो। यह हमारे साथ नाइंसाफी है।”
दूसरे शिक्षक ने कहा – “दूसरे शिक्षक ने कहा, “अगर हमें आवेदन करने तक से रोक दिया जाएगा तो हमारा भविष्य ही खत्म हो जाएगा।
सरकार पर बढ़ा दबाव
सुप्रीम कोर्ट का आदेश आने के बाद अब सरकार और शिक्षा विभाग पर भी दबाव बढ़ गया है।
सरकार से उम्मीद की जा रही है कि वह कोई रास्ता निकाले ताकि कार्यरत शिक्षकों को राहत मिल सके।
आगे क्या?
फिलहाल, सुप्रीम कोर्ट का आदेश साफ है – बिना TET पास किए कोई भी शिक्षक पहली से आठवीं तक नहीं पढ़ा सकता।
अब सवाल यह है कि क्या सरकार इस पर कोई विशेष नियम बनाएगी या फिर शिक्षक संगठनों की अपील पर दोबारा कोर्ट में सुनवाई होगी।

