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क्या समुद्र में भी लगेगा ‘टोल टैक्स’? 400 साल तक डेनमार्क ने वसूली फीस, अब ईरान की बारी!

Credit Aaj Tak

ईरान ने होर्मुज स्ट्रेट में टोल लेने का फैसला किया है. इससे बड़ा सवाल खड़ा हो गया है कि क्या समुद्र में भी टोल लिया जा सकता है, और क्या इतिहास में पहले कभी ऐसा हुआ है? दरअसल, वेस्ट एशिया में जारी तनाव के बीच ईरान ने इजरायल और अमेरिका के जहाजों की होर्मुज में एंट्री पर रोक लगा दी है.

होर्मुज स्ट्रेट दुनिया के सबसे व्यस्त समुद्री मार्गों में गिना जाता है. ऐसे में अगर यहां से गुजरने वाले जहाजों से टोल वसूला जाता है, तो ईरान को इससे भारी कमाई हो सकती है. ईरान का कहना है कि इस योजना के तहत जलडमरूमध्य की सुरक्षा, जहाजों की सेफ्टी, पर्यावरण संरक्षण, वित्तीय व्यवस्था और रियाल आधारित टोल सिस्टम तैयार करने की योजना शामिल है.

डेनमार्क ने भी वसूला था समुद्री टैक्स

अब सवाल उठता है कि क्या खुले समुद्र या प्राकृतिक जलमार्गों पर टोल लगाने का कोई पुराना उदाहरण है? इतिहास के पन्ने पलटें तो डेनमार्क का नाम सामने आता है.

आज जो कदम ईरान उठा रहा है, कुछ वैसा ही लगभग 600 साल पहले डेनमार्क ने भी किया था. डेनमार्क द्वारा वसूला गया समुद्री टोल ‘साउंड ड्यूज़’ के नाम से मशहूर था. यह टैक्स उन जहाजों पर लगाया जाता था, जो साउंड स्ट्रेट से गुजरते थे. साउंड एक अहम प्राकृतिक समुद्री रास्ता है, जो उत्तरी सागर और बाल्टिक सागर को जोड़ता है, और उस समय इस पर डेनमार्क का नियंत्रण था.

क्या था ‘साउंड ड्यूज’?

‘साउंड ड्यूज’ एक तरह का समुद्री टोल टैक्स था, जो ओरेसुंड जलडमरूमध्य (डेनमार्क और स्वीडन के बीच) से गुजरने वाले जहाजों से लिया जाता था. 16वीं और 17वीं सदी में यह टैक्स डेनमार्क की कुल आय का करीब दो-तिहाई हिस्सा बन गया था.

इस टैक्स की शुरुआत 1429 में किंग एरिक ऑफ पोमेरेनिया ने की थी. यह व्यवस्था 1857 में कोपेनहेगन सम्मेलन तक लागू रही. इससे पहले ग्रेट बेल्ट जलडमरूमध्य में भी डेनिश क्राउन टोल वसूलता था.

किन देशों को देना पड़ता था टैक्स?

1429 से 1857 के बीच डेनमार्क ने ओरेसुंड जलडमरूमध्य से गुजरने वाले लगभग सभी विदेशी व्यापारिक जहाजों से यह टैक्स वसूला. इसमें मुख्य रूप से नीदरलैंड, इंग्लैंड, फ्रांस, स्पेन, हैनसेटिक लीग (जर्मन शहर) और बाल्टिक क्षेत्र के जहाज शामिल थे.

यह शुल्क बाल्टिक सागर में व्यापार करने वाले लगभग सभी बड़े यूरोपीय देशों पर लागू था.

ओरेसुंड से गुजरने वाले हर विदेशी जहाज को, चाहे उसका गंतव्य डेनमार्क हो या नहीं, हेलसिंग्योर में रुककर टोल देना पड़ता था. अगर कोई जहाज टोल देने से मना करता, तो वहां तैनात तोपों से उस पर हमला कर उसे डुबो भी दिया जाता था.

1567 में इस टोल व्यवस्था में बदलाव किया गया और इसे माल की कीमत के 1–2% के रूप में तय कर दिया गया. इससे डेनमार्क की कमाई तीन गुना बढ़ गई. साथ ही यह सुनिश्चित करने के लिए कि जहाज के कप्तान माल की कीमत कम न बताएं, डेनिश सरकार को यह अधिकार था कि वह घोषित कीमत पर माल खरीद सकती है.

शुरुआत में स्वीडन को इस टैक्स से छूट दी गई थी, क्योंकि वह कालमार यूनियन का हिस्सा था. लेकिन 1613 में कालमार युद्ध और क्नेरेड संधि के बाद डेनमार्क-नॉर्वे ने स्वीडन से जुड़े व्यापार पर भी टोल लगाना शुरू कर दिया. इसी से आगे चलकर 1643 के टॉर्सटेनसन युद्ध की नींव पड़ी.

कैसे खत्म हुआ ‘साउंड ड्यूज’?

समय के साथ यह समुद्री टोल अंतरराष्ट्रीय व्यापार के लिए बड़ी बाधा बन गया. कई यूरोपीय देशों ने इसका विरोध करना शुरू कर दिया. 19वीं सदी तक यह विवाद काफी बढ़ गया.

आखिरकार 1857 में एक अंतरराष्ट्रीय समझौते के तहत ‘साउंड ड्यूज’ को खत्म कर दिया गया. इस समझौते के तहत कई देशों ने डेनमार्क को एकमुश्त मुआवजा दिया, ताकि यह टोल सिस्टम हमेशा के लिए बंद किया जा सके.

यह मामला आज भी अंतरराष्ट्रीय समुद्री कानून के विकास में एक अहम उदाहरण माना जाता है. इसने यह सिद्धांत मजबूत किया कि प्राकृतिक समुद्री रास्तों पर सभी देशों को बिना किसी रुकावट के आवाजाही का अधिकार होना चाहिए.

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